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शाहनवाज़ सिद्दीकी


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भ्रष्टाचार का हमाम और वोट की ताक़त!

Posted On: 14 Jan, 2012  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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कुर्बानी क्या है?

Posted On: 14 Nov, 2011  
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सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा

Posted On: 4 Nov, 2011  
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‘सामाजिक सुरक्षा’ विषय पर मेरी बात

Posted On: 20 Jul, 2011  
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देश की चूलें हिला रहा है धार्मिक भ्रष्टाचार

Posted On: 5 Jul, 2011  
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कब तक लड़ेंगे अपनी-अपनी लड़ाई?

Posted On: 4 Jul, 2011  
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ओबामा या ओसामा?

Posted On: 14 May, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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के द्वारा:

------हमारे देश में प्रधानमंत्री पद के लिए चुनाव जनता के द्वारा नहीं बल्कि सांसदों के द्वारा किया जाता है--------- क्या यार जोक मारते हो । क्या चलती है सांसदों की । आला कमान चाहता है वही होता है । व्हीप की चीठ्ठी घुमाई जाती है ईसे प्रधान मंत्री बनाना है । कोइ अनादर करे तो उसे पार्टी से निकाला जाता है । दलबदल का कानून भी राजीव ईस कारण लाया था के सांसद उस के काबू में रहे । सांसद को ही गुलाम बनाया और सुत्र दिया मेरा भारत महान । वाह भई वाह । ईस बार नौनिहाल में खाना पिरोसने वाली मां और खूद बच्चा भूखा रहे ये तो हो ही नही सकता । २००४ और २००९ बच्चा छोटा था, दूध के अलावा और खाना नही खा सकता था । अब तो दांत उग गये हैं । आप की बात सही है परिवार के कारण ही उसे नेता कहा जाता है । नेता जनमसे नही बनता कर्मो से बनता है । ईस ने तो अभीतक कर्म किया ही नही । ये एक सिम्बोल है ही है क्रोंग्रेसियों के लिये, और मजबूरी भी । ईस का नाम आगे करदो तो अच्छे से अच्छा कोंग्रेसी नेता अपना दावा ठोकेगा नही । और कोंग्रेस तुटेगी नही । गुलाम की तरह सब कोंग्रेसी एक छत के निचे ही रहेन्गे । ये मजबूरी कोन्ग्रेसियो की हो सकती है भारतियों की नही ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

पारीक जी, मैंने कब कहा कि उन्होंने कोई ऐसा कार्य किया है? बल्कि मैंने तो खुद ऊपर लिखा है कि राहुल गाँधी अभी तक अपने आपको साबित नहीं कर पाएं हैं, और जिस मुकाम पर हैं, वहाँ केवल अपने परिवार के नाम के कारण ही पहुँच पाएं हैं. पहली बात तो यह कि केवल संशय के आधार पर यह इलज़ाम लगा देना कि स्टेंडिंग कमिटी केवल उनके प्रभाव में कार्य कर रही है, कहीं से भी अन्ना जैसे कद के व्यक्ति को शोभा नहीं देता है. इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप राजनेता तो लगाते हैं, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता नहीं. दूसरी बात यह कि हमारे देश में प्रधान मंत्री कौन बनना चाहिए और कौन नहीं, इसका फैसला संसद करती हैं ना कि सीधे जनता. जनता केवल जन प्रतिनिधि अर्थात संसद सदस्यों का चुनाव करती है और प्रधान मंत्री का फैसला उनके विवेक पर छोड़ा जाता है. इस पर किसी पार्टी के किसी भी नेता के लिए यह कहना कि वह प्रधान मंत्री पद के लायक नहीं है, कहीं से भी अन्ना जैसे जुझारू सामाजिक कार्य कर्ता को शोभा नहीं देता है. आज बहस इस बात पर होनी चाहिए, कि सरकार ने जो सुझाव दिए वह क्यों गलत अथवा सही हैं, जबकि हो यह रहा है कि जो टीम अन्ना कहे वही, जस का तस सही और बाकी सब बकवास है... क्या पुरे देश में सिर्फ और सिर्फ टीम अन्ना ही अकलमंद है? और अगर उनको लगता है कि वह ही केवल अकलमंद हैं तो उन्हें देश को चलाने के लिए जनता के बीच में जाकर प्रतिनिधित्व की मांग करनी चाहिए और जनता से सीधे चुनकर अपनी बात को करके दिखाना चाहिए.

के द्वारा:

के द्वारा: शाहनवाज़ सिद्दीकी शाहनवाज़ सिद्दीकी

के द्वारा: शाहनवाज़ सिद्दीकी शाहनवाज़ सिद्दीकी

शाहनवाज जी , नमस्कार ! हिंदी की दुर्दशा पर आपके उत्तम विचार पढ़ गौरव का अनुभव हुआ . हिंदी के साथ साथ ही हिन्दुस्तानियों का भविष्य भी जुड़ा हुआ है . किन्तु हिंदी की दुर्दशा के जिम्मेदार कोई विदेशी नहीं हमारे ही अविवेकी भाई बंध हैं . आप अपने स्वयं के आसपास देख लीजिये , लोंगों में बहुमत अंग्रेजी में काम करने की इच्छा रखने वालों का ही मिलेगा . आपको ज्ञात ही होगा की जब आज़ादी के बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के साथ साथ ही हिंदी भाषा की शिक्षा समूचे भारत में अनिवार्य करने का मुद्दा उठा तो दक्षिण में तीव्र विरोध हुआ यहाँ तक की एक नागरिक ने हिंदी के विरोध में आत्मदाह भी कर लिया . उस समय के राज नेताओं में आज के नेताओं से अधिक मानवीयता थी सो एक व्यक्ति का आत्मदाह हिन्दुस्तान में हिंदी की शिक्षा की अनिवार्यता रोकने में कामयाब हो गया .दुःख और शर्म की बात है कि उस दक्षिण में हिंदी का विरोध हुआ जिस दक्षिण कि अधिकांश भाषाएँ हिंदी की बड़ी बहन संस्कृत से जन्मी थीं उससे भी अधिक शर्मनाक यह कि उन्हें हिन्दुस्तानी हिंदी से परहेज था और गुलामी की निशानी अंग्रेजी उनकी शान . जब तक पूरा देश हिन्दुस्तानी नहीं हो जाता हिंदी की दशा में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं दिखती . आज परिस्थियाँ परिवर्तित हुई हैं वे दक्षिण भारतीय जो हिंदी भाषी राज्यों में कार्यरत हैं हिंदी के अच्छे ज्ञाता हैं किन्तु हिंदी में कामकाज आज के कंप्यूटर युग में तब तक तो संभव नहीं है जब तक आप जर्मनी ,जापान, चीन ,रूस,कोरिया,फ़्रांस की तरह अपनी भाषा का सरलीकरण कर सर्च इंजन सहित जरुरी साफ्टवेयर विकसित नहीं कर लेते. वर्तमान सोफ्टवेयर पर्याप्त नहीं . हिंदी की समृद्धता स्वाभाविक रूप से भाषा को क्लिष्ट बनाती है और समृद्धि के लिए सभी व्यक्ति समान रूप से प्रयासरत नहीं होते अधिकाँश भारतीय यथास्थिति से संतुष्ट रहने वाले स्वाभाव के हैं जब तक यह असहायता में संतोष की प्रवृति परिवर्तित नहीं होती हिंदी और हिन्दुस्तान दोनों की दशा सुधरने की कम ही संभावना है . ...चर्चित चित्रांश

के द्वारा: charchit chittransh charchit chittransh

के द्वारा: राजीव तनेजा राजीव तनेजा

के द्वारा: शाहनवाज़ सिद्दीकी शाहनवाज़ सिद्दीकी




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